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पंचतंत्र कहानियाँ Hindi stories for kids panchatantra

हम लाये है आप के लिए panchtantra ki kahaniya या फिर कहे bachon ki kahaniyan in hindi इस आर्टिकल में आप को moral stories for childrens in hi...

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Thursday, 6 September 2018

बच्चों की नई कहानी kahaniya in hindi

- No comments
अगर आप बच्चों के लिए नई कहानिया ढूंड रहे है तो आप यहाँ bachon ki kahaniyan in hindi और baccho ki kahaniya या child story in hindi में पढ़ सकते है इसके आलावा आपको hindi panchatantra stories और moral stories in hindi भी मिल जाएंगी और short stories in hindi या story for kids in hindi भी आप यहाँ read कर सकते हो बच्चो को बहुत पसंद आएंगी.


                                               कहानी 1 :- प्यासा कौवा


गर्मी के दिन चल रहे थे , एक प्यासा कौवा पानी की तलाश में सभी खेतों में उड़-उड़ कर पानी खोज रहा था .
वो पानी खोज-खोज के थक चुका था लेकिन उसे पानी नहीं मिला वो लगभग अपनी सारी उम्मीद छोड़ चूका था.
तभी अचानक, उसने नीचे एक पानी का सुराही देखा ।
वह सीधे नीचे गया ये देखने के लिए की उसमे पानी है की नहीं।
उसने जग के अंदर कुछ पानी देखा वो खुश हो गया!
कौए ने अपने  सिर को जग में डालने की कोशिश की लेकिन अफसोस की बात है,
जग की गरदन काफी पतली थी उसको अपना सर अन्दर डालने में दिक्कत हो रही थी और
पानी काफी नीचे था इसकी वजह से वो पानी तक नहीं पहुँच पा रहा था.
कौवा थोड़ी देर के लिए परेशान हो गया फिर उसने चारों ओर देखा, उसने कुछ कंकड़ देखे जो जमीन पर पड़े थे। अचानक उसके दिमाग में एक विचार आया। उसने एक के बाद एक कंकड़ को उठाकर, जग में डालने लगा।
अब पानी धीरे-धीरे ऊपर आने लगा था .
कौए की मेहनत रंग ला रही थी.
बहुत जल्दी ही पानी घड़े के ऊपर आ गया और कौए ने अपनी प्यास बुझा ली.
"अगर आप मेहनत की कोशिश करोगे तो जल्दी ही आप की समस्या का हल होगा"



                                     कहानी 2 :-  ग्वालिन 

एक ग्वालिन थी और वो गाय का दूध बेचती थी। एक दिन वह बाजार जा रही थी और उसके सिर के ऊपर दूध की सुराही राखी हुई थी जिसमे दूध भी था|
वह जाते-जाते रास्ते में सोचने लगी सब बातें वह बेचने के बाद कर सकती थी के सपने को शुरू किया की में दूध बेचूंगी उससे जो पैसे आएँगे "उस पैसे के साथ", में दूकान से मुर्गियां खरीदूंगी और वो मुर्गियां रोज अंडे भी देंगी और फिर उन अन्डो को बाजार में बेच दूंगी इससे में और भी पैसे कमा लुंगी.
ऐसा कह के वह अब ये सोचने लगी की अब उन "पैसों का क्या करूंगी', "सोचती हूँ","सोचती हूँ" हाँ उन "पैसों से में अपने लिए कपड़े और टोपी भी खरीद लुंगी और जब में उनहे पहन कर बाहर जाउंगी तो सब मुझे ही देखंगे" ऐसा सोच सोच के वह चलती गई और इन खुश विचारों के साथ, वह मटकी छोड़ और कूदने लगी।
उसके कूदने से सुराही सर से नीचे जमीन पर गिर गई और सुराही टूट गई और सारा दूध जमीन पर गिर गया और वह जमीन पे बैठ कर रोने लगी और घर वापस गई और अपनी माँ को सारी बातें बताई.
"जब तक हाथ में कुछ हो नहीं तब तक उस बात का अंदाजा नहीं लगाना चाहिए".



                                        कहानी 3 :- पेंसिल के दृष्टांत

एक बार एक पेंसिल बनाने वाला था जो अपनी बनाई हुई पेंसिल से बाते करना चाहता था. उसने कहा की में तुम्हे बॉक्स में डालने से पहले.।
उसने पेंसिल से कहा, "इससे पहले कि मैं तुंहें दुनिया में भेज रहा हूँ, "में तुम्हे 5 चीजें बताने जा रहा हूँ जो तुमको पता होनी चाहिए , जिससे की तुम बहुत ,महान pencil बन पाओगी"  ।
एक: "अपने आप को किसी के हाथ में जाने की अनुमति दो तो तुम कई बड़े काम करने में सक्षम हो जाएगी, लेकिन केवल अगर तुम अपने आप को किसी को अपने हाथ में पकड़ने डौगी तो''.
दो: "तुम एक दर्दनाक अनुभव होगा समय-समय पर पैनापन करना पड़ेगा, लेकिन तुम इसे एक बेहतर बनने के लिए की आवश्यकता होगी
तीन: "तुमसे गलतियाँ भी हो सकती है लेकिन तुम उसे ठीक भी कर सकती हो क्यूंकि pencil के पीछे रब्बर होती है और उससे साफ़ किया जा सकता है"
चार: "तुम्हारा सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा तुम्हारे अंदर है."  ("pencil का सिक्का")
पांच: "चाहे कोई भी हालात हो तुम्हे लिखना है बस लिखना है, तो तुम अपनी छाप छोड़ देना। कोई फर्क नहीं पड़ता कोई भी शर्त हो, तुम लिखना जारी रखना. "
पेंसिल समझ गइ और याद करने का वादा किया, और उसके दिल में उद्देश्य के साथ बॉक्स में चली गइ ।


अब पेंसिल की जगह अपने साथ रख ले । हमेशा उंहें याद है और कभी नहीं भूलना, और तुम सबसे अच्छा व्यक्ति बन जाओगे ।
एक: "भगवान् कह रहे है आप कई महान काम करने में सक्षम हो जाएंगे, लेकिन केवल अगर तुम अपने आप को भगवान में आयोजित होने की अनुमति दे तो" जब तक हम अपनी ज़िन्दगी परमेश्वर के हाथ नही देते है तो हमारी ज़िन्दगी किस काम की है. जैसे pencil बनाने वाले ने कहा था की जब तक pencil को कोई उठा के लिखता नहीं है तब तक pencil किसी काम की नहीं है उसकी तरह से जो हमारी ज़िन्दाही है जब तक हम अपनी जिंदगी भगवान् के हाथ नहीं देते तो हमारी जिंदगी भी किस काम की है.
तो खुद को भगवान् के हाथो में देदो और भी अच्छा होगा शयद आपने बहुत से गुण हो लेकिन अगर आप भगवान् के साथ मिलकर काम करोगे तो और भी अच्छे से कर पाओगे.

दो: "अगर आप ताकतवर बनना चाहते हो तो समय-समय पर एक दर्दनाक तेज का अनुभव होगा. आपको भी pencil की तरह छीला जाएगा जीवन में समस्या आएंगी, और ये सब जरूरी भी है इससे आपको सीख मिलेगी एक मजबूत व्यक्ति बनने के लिए आवश्यकता होगी । जिस तरह से pencil को छीलना पड़ता है अच्छी तरह से लिखने के लिए उसी तरह से हमारी ज़िन्दगी में भी मुश्किलें आती है परेशानिया आती है जिससे की हम और मजबूत बन सके और अच्छे इंसान बन सके. और जब मुश्किलें आपकी ज़िन्दगी में आएंगी तो आपने घबराना नहीं है उस मुश्किलों का सामना करना है हारना नहीं है और उनसे कुछ सीख लेनी है और जब आप उन मुश्किलों से कुछ अच्छा सीख लोगे तो आप देखोगे की आप अपनी ज़िन्दगी में और अच्छे से आगे बड़ पाओगे.

तीन: "भगवान् कह रहे है की आप गलती कर सकते है लेकिन उन्हें तुम सही भी कर सकते हो और अगर ठीक नहीं कर सकते हो तोह उनसे कुछ सीख सकते हो और आगे बढ़ सकते हो","जिस तरह से pencil के पास रबर है जिससे वह अपनी गलतियां मिटा सकती है उस तरह से हमारे पास भी रास्ते है जिनसे हम अपनी गलतियां मिटा सकते है". लेकिन पहली चीज़ ये है की हमे हमारी ego को side में रखना होगा और हमे सीखना होगा और अपनी गलती को सुधरने के लिए सॉरी कढ़ना सीखना होगा कई बार मुश्किल हो जाता है सॉरी कहना आपको लगता है सब कुछ ठीक है और आप सॉरी नहीं बोलते तो सॉरी बोलना बहुत जरुरी है. कई लोग बोल देते है दोस्ती में नो सॉरी नो थैंक you लेकिन सॉरी बोलना चाहिए जिससे की लोगो को भी लगे की हमे अपनी गलती का एहसास है. लेकिन सॉरी बोलना ही नहीं है दिखाना भी है की हाँ वाकई में आपको अपनी गलती का एहसास है तभी उस सॉरी का कुछ मतलब बनता है की सुच में आपको अपन गलती का एहसास है.


चार: "आप का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आपके अंदर है हमारा दिल है हमारे सोच है ये फर्क नही पड़ता की आप बहार से कैसे चाहते किस्त्ने भी सुन्दर आकर्षण दिखे लेकिन आप अंदर से कैसे है ये इसका फर्क पड़ता है." तो हमे अन्दर से अच्छा बनना है अगर आप अन्दर से अच्छे नहीं है तो आप बाहर से चाहे कितने भी अच्छे क्यूँ ना हों लोग आपसे दूर जाने लगेंगे लेकिन अगर आप अन्दर से अच्छे है न तो आप बाहर सेव्चाहे जैसे हों लोग आपको बहुत प्यार करेंगे पसंद करेंगे क्यूंकि अन्दर की जो सुन्दरता है वो ही बाहर निकलती है वो दिखती है वो रक रौशनी की तरह है जो अन्दर से बाहर निकलती है. जिस तरह से pencil को पता है की उसके अन्दर का सिक्का ही सबसे ज्यादा important है उसी तरह आपको भी याद रखना है जो आपके अन्दर है वो सबसे important है और वो चीज आपसे कोई छींन नहीं सकता है तो आप अपने अंदर के हिस्से को जितना सुन्दर जितना चचा बना सकते हो बना दो. और वो आप कैसे करेंगे लोगो से प्यार करके भगवान् से प्यार करके लोगो से अच्छी बाते करके लोगो की मदद करके अच्छे काम करके.

पांच: "आप चाहे किसी भी हालत में हो, आपको गहरा और अच्छा निशान छोड़ देना है" भगवान् की महिमा के लिए। जिस तरह से pencil जिस शान से जहाँ भी वो लिखती है एक गहरा निशान छोड़ती है और उतने ही शान से जिसके हाथ में pencil है उसे वाह-वाह मिलती है उसी तरह से हम भगवान् के हाथों में है और हमे एक गहरा निशान छोड़ना है इस दुनिया में जिससे भगवान् की वाह-वाह हो उनका भी नाम ऊँचा उठे हमे एसे काम करने है ऐसे अच्छे काम करने है की लोग कहे की वाह.... कई लोग सोचते है की में तो एक मामूली इंसान हूँ में नहीं इतना कुछ कर सकता लेकिन याद है पहले भी एक बात बताई है की आप किसके हाथ में है भगवान् के हाथ और आप उनके साथ बहुत कुछ कर सकते है बस आपको पहले ये फैसला करना होगा की मुझे इस काम को करना ही करना है.

एसे ही और भी कहानी पढने के लिए.
मजेदार कहानिया :- hindi kahani
बच्चों  के लिए मजेदार कहानी :- child story in hindi

Wednesday, 5 September 2018

बच्चो के लिए मजेदार कहानी child story in hindi

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अगर आप बच्चो के लिए मजेदार kahaniya ढूंड रहे है या खोज रहे है moral stories in hindi और baccho ki kahaniya तो आप बिलकुल सही जगह पर है यहाँ आपको story for kids in hindi और motivational story in hindi या panchatantra stories in hindi में मिल जाएगी और stories in hindi या फिर hindi kahaniyan bachon ki आप इस post के द्वारा read कर सकते हो.




                                         कहानी 1 :- चलाक लोमड़ी और सारस 

किसी जंगल में बहुत ही चतुर लोमड़ी रहती थी उसे दूसरों को पागल बनाने में बहुत मज़ा आता था सारस उस चालक लोमड़ी का मित्र था और वह बहुत सीधा साधा था. उस लोमड़ी ने सोचा क्यूँ न उसके साथ मज़ाक किया जाए एक बार उस स्वार्थी लोमड़ी ने अपने घर में सारस को रात के खाने पर आमंत्रित किया और सारस ने धन्यवाद किया और बोला में जरूर आऊंगा. सारस उस लोमड़ी के घर गया लोमड़ी ने पहले से ही योजना बना राखी थी उसने प्लाटों में soup परोसा.
लोमड़ी के लिए उस plate से soup पीना कोई मुश्किल नहीं था लेकिन सारस बेचारा वह केवल अपनी चोंच का आखरी सिरा ही soup में भिगो पाया चोंच से भला वह soup केसे पीता तो इस वजह से वह भूखा ही रहा और उसने खुद को बहुत अपमानित महसूस किया और उसको समझ आ गया की लोमड़ी ने उसका मजाक उड़ाने के लिए ही दावत पे बुलाया है और जब वह उदास हो गया तो लोमड़ी बोली! क्यों खाना पसंद नहीं आया? सारस बोला बहुत अच्छा खाना था और बोला तुम भी किसी दिन मेरे यहाँ आओ और भोजन का आनंद लो सारस इस अपमान के बाद उसने अपने मन में सोच लिया था की वह अपने इस अपमान का बदला जरूर लेगा.
दुसरे दिन लोमड़ी सारस के घर पहुँच गई और वह अपने साथ सारस को गिफ्ट में देने के लिए कुछ भी नहीं लाइ थी और उसने सोचा की में खूब जम कर खाएगी.



सारस ने भी soup त्यार किया और soup को लम्बी गर्दन वाली सुराही में परोसा और सारस ने तो अपने लम्बी चोंच से सारा soup पी गया लेकिन लोमड़ी सुराही के चारो ओर चक्कर ही लगाती रह गई और बस आईडिया ही लगाती रही के आखिर इस soup को कैसे पिया जाए और साड़ी कोशिशों के बावजूद भी वह soup ना पी पाई और उसे भी सारस की तरह भूखा ही रहना पड़ा और इस तरह बेचारे सारस ने अपने अपमान का बदला उस चतुर लोमड़ी से लिया.
"जैसे को तैसा" तो इस कहानी से यही शिक्षा मिलती है की जो जैसा व्यवहार करता है उसके साथ भी वैसा व्यवहार होता है.



                                                कहानी 2 :- मेमना और भेड़िया 

एक दिन एक चोट मेमना भेड़ों के झुंड के साथ घास चराने गया था और वह बहुत शैतान था अपनी शरारत की वजह से एक दिन वह भटक गया और उसे वह घास दिखाई दि और वह उसे बहुत मज़े लेके खाने लगा और वह चोट मेमना अपने झुंड से काफी दूर आ गया था और इस बात से वह अनजान था लेकिन वह एक और बात से अनजान था एक लोमड़ी उसका पीछा कर रही थी और जब उसको एहसास हुआ की वह अपने झुंड से कही और आ गया है तो उसने वापस जाने का फैसला किया तो जैसे ही वह जाने लगा तभी उसने देखा एक भूखा चालक भेड़िया खड़ा था जो उसके सामने आ गया था अब मेंमने को यही लगने लगा की अब कुछ नहीं हो सकता भाई अब में मारा जाउगा ये मुझे खा जाएगा.
मेमने ने भेड़िये से कहा :- क्या आप मुझे खा जाओगे?
भेड़िये ने कहा :- हाँ किसी भी कीमत पर.
मेमने ने कहा :- क्या आप कुछ देर इंतज़ार कर सकते है?
भेड़िये ने कहा :- लेकिन क्यूँ?
मेमने ने कहा :- मेने बहुत सारा घास खा लिया है मेरा पूरा पेट घास से भर चूका है अगर आप मुझे अभी खा लेंगे तो आपको मज़ा नहीं आएगा आपको लगेगा की आप घास खा रहे हो तो जब तक घास पाच नहीं जाता तब तक आप इंतज़ार करें.
भेड़िया बोला :- ठीक है.
मेमने ने कहा :- धन्यवाद.
भेड़िया कुछ देर बाद मेंमने को मारने के लिए तैयार हो गया लेकिन मेंमने ने उसे फिरसे रोक दिया.
मेमने ने कहा :- प्यारे भेड़िये क्या आप कुछ और देर इन्तिज़ार कर सकते हो घास अभी तक पची नहीं है तो आप मुझे थोडा नाचने दो तो ये आसानी से पाच भी जायगा और आप मुझे खा सकेंगे.
भेड़िया :- हा ये भी ठीक है.



मेमना पागलों की तरह नाचने लगा और फिर एक दम से रुक गया.
भेड़िये ने कहा :- क्या हुआ रुक क्यूँ गए?
मेमना बोला :- में नाच नहीं पा रहा हूँ क्यूंकि कोई संगीत ही नहीं है.
भेड़िये ने कहा :- तो अब क्या कर सकते है?
मेमने ने कहा :- क्या मेरे गले में ये लटकी हुई घंटी देख रहे हो क्या आप इसको जोर से बजा सकते हो तो इससे मुझे नाचने में भी मजा आयगा और मेरे पेट में जो घास है वो भी जल्दी पच जाएगा.
भेड़िया : वह किसी भी कीमत पर मेंमने को खाना चाहता था वह कुछ भी करने को त्यार था इस वजह से वह मान गया और उसने मेमने के गले से घंटी उतार कर अपनी पूरी ताकत के साथ उसे बजाने लगा.
चरवाहा मेमने को ढूंड रहा था की अचानक उसे घंटी की आवाज सुनाई दी और वह उस घंटी को सुनते उसी तरफ चला गया और तभी उसने उस भेड़िये को मेमने के साथ देखा और बहुत जोरो से उसकी तरफ भागा और ये देख कर भेड़िया वहां से भाग गया और मेमना बच गया.
तो इस कहानी से हमे यही सीख मिलती है की शारीरिक ताकत से ही सब कुछ नहीं होता कभी-कभी कमजोर लोग अपनी होशियारी से अपने दिमाग का इस्तेमाल करके ताकतवर लोगों पर काबू पा सकते है.



                                                  कहानी 3 :- लोमड़ी और अंगूर 

गर्मियों का मौसम था एक लोमड़ी तेज धुप में भूखी प्यासी जंगल में घूम रही थी और उसकी तबियत ख़राब होने की वजह से वह शिकार भी नहीं कर पा रही थी वह सोचने लगी कबसे भूकी प्यासी घूम रही काश कुछ खाने को मिल जाए और आगे चलती गई की उसकी नजर एक पेड़ पर पड़ी जहाँ अंगूरों के कुछ गुच्छे उसे दिखाई दिए और वह खुश हुई और जब वह उस पेड़ के पास आई उसने देखा की अंगूर के अंगूरों के गुच्छे बहुत ऊपर है जहा वह पहुँच नहीं पा रही थी. वह कोशिश करती है उन अंगूरों के गुच्छे को पकड़ने की और पर नहीं पकड़ पाती है वह फिर से कोशिश करती है और गिर जाती है. जब वह उनको नहीं पकड़ पाती है तो वह कहने लगती है की आरे ये अंगूर तो खट्टे है कच्चे भी है में अपना पेट ख़राब नहीं करना चाहती हुह... कौन खाएगा इन्हें.... ये तो देखने में भी अच्छे नहीं लग रहे है में इन्हें खाना ही नही चाहती ओए वह से चली जाती.
जब चीज़ लोगो को आसानी से नहीं मिल पाती तो लोग उसे ख़राब कहने लगते है लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिए हमे उस चीज़ को बुरा कहने से पहले सोचना चाहिए की हमने उस चीज़ को पाने के लिए कितना प्रयास किया.
प्रयास में सफल न होने पर बहाना नहीं करना चाहिए.



एसे ही और भी कहानी पढने के लिए.
मजेदार कहानिया :- hindi kahani

Tuesday, 4 September 2018

पंचतंत्र कहानी kahaniya in hindi

- No comments
अगर आप खोज रहे है panchatantra kahaniya या panchatantra stories in hindi तो आप इस post में जरुर पढ़ सकेंगे और baccho ki kahaniya या child story in hindi या फिर inspirational stories in hindi में read करें और बच्चों को सुनाय भी और पढाएं भी आपको short stories in hindi जरुर पसंद आयंगी.


                             कहानी 1 :- खरगोश और कछुए की कहानी

एक बार की बात है एक खरगोश और कछुआ कही जा रहे थे और अचानक से आपस में मिल गए और दोनों में खूब बातें हुई हसी मजाक हुई और तभी आपस में दोनों की हार जीत को लेकर बेहेस होने लगी तो खरगोश ने कहा की एक race करते है और जो सबसे पहले पहाड़ी के दुसरी तरफ पहुंचेगा वो जीत जायगा और तभी फैसला हो जाएगा की कौन किस से कम है क्यूंकि खरगोश बहुत चालक था उसने सोचा की में तो जल्दी से दौड़ के भाग जाऊंगा और ये कछुआ तो अपनी धीमी-धीमी चाल से कहा मुझसे जीत पाएगा तो दोनों की race start होती है की खरगोश आगे निकल जाता है और वह थक जाता है वह सोचता है की में तो बहुत आगे निकल आया हूँ थोड़ा आराम कर लेता हूँ तो एक पेड़ की छाया में लेट जाता है आराम करते-करते उसको नींद आ जाती है वह सोचता है की थोड़ा सो लेता हूँ कछुआ तो अभी बहुत दूर है और आसानी से उसको में हर दूंगा खरगोश सो जाता है और वह जब तक उठता है की वह देखता है कछुआ finishing line तक पहुँच गया है जब तक खरगोश तेजी से भागते हुए आता है इतने में कछुआ line cross कर लेता है और वह जीत जाता है.
aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa


इस कहानी से हमे सीख मिलती है की ज्यादा over confident नहीं होना चाहिए कभी इससे हमे ही नुक्सान हो सकता है और न ही किसी को किसी से कम समझना चाहिए. अगर लगातार जीतना है तो आपको team में काम करना होगा और सीखना होगा, आपको अपनी काबीलियत के आलावा दूसरों की ताकत को भी समझना होगा.
एक बात का और ध्यान दीजिये की जब कभी आप फैल हों तो या तो ज्यादा मेहनत कीजिये या फिर अपनी planing को chnage करिए या फिर दोनों ही कर सकते है , पर कभी भी हार को आखिरी मान कर मत बैठ जाइए उससे लड़िये दरिये नहीं बड़ी से बड़ी हार के बाद भी जीता जा सकता है!

                                 कहानी 2 :-किसान और सारस 

एक किसान बगुलों से बहुत तंग आ गया था उसके खेत जंगल के पास था किसान जैसे ही बीज बो कर अपने घर जाता वेसे ही सरे पक्षी अपने झुंड के साथ आते और मट्टी कुरेद-कुरेदकर बोये हुए बीजो को खा जाते. किसान पक्षियों को उड़ाते-उड़ाते थक चूका था और फिरसे उसे खेत को दुबारा से जोतना पड़ता और इसी वजह से किसान बहुत ज्यादा परेशान हो गया था एक दिन उसने सोचा क्यूँ ना एक जाल बिछा दूँ और उसने ऐसा ही किया खेत पे उसने जाल बिछा दिया और इस बार फिर से उस खेत में पक्षी आए और उस जाल में फँस गए और इस बार एक सारस पक्षी भी उस जाल में फँस गया.

और जब किसान ने उस पक्षियों को पकने गया तो एक सारस भी पकड़ा गया और तभी वह सारस बोला की मुझे माफ़ करिये दया करिए मुझपे मैंने आपका कोई नुख्सान नहीं किया है. में तो सारस हूँ खेती को हानी पहुँचाने वाले कीड़ों को में खा जाता हूँ मुझे छोड़ दीजिये.
लेकिन किसान बहुत ही गुस्से में था. वह बोला! - 'तुम कहते हो मुझे माफ़ करो मेने कुछ नहीं किया है और आज तुम उन्ही चिड़ियों के साथ मिलकर मेरे खेत के सारे बीज को खा गए हो अब जब तुमने भी ऐसा किया है तो तुम भी दंड भुगतो'.
इस कहानी से हमे यही शिक्षा मिलती है की हम जैसी सांगत में रहते है वेसे ही बन जाते है.

                                 कहानी 3:- प्यासी चींटी और कबूतर 


एक दिन की बात है गर्मियों का मौसम था एक प्यासी चींटी पानी की तलाश कर रही थी कुछ देर इधर-उधर पानी के लिए भटकती रही लेकिन पानी नहीं मिला और वह चली गई और तभी उसे एक नदी दिखाई दि चींटी उस नदी के पास पहुंची लेकिन पानी पीने के लिए वह सीधे नदी में नहीं जा सकती थी इस वजह से वह एक पत्थर पर चढ़ गई और पानी पीने की कोशिश कर रही थी की वह नदी में ही गिर गई उस नदी के पास एक पेड़ था जहाँ एक कबूतर पेड़ की टेहनी में बैठा था और उसने उस चींटी को नदी में गिरते हुए देख लिया और उसे तरस आ गया और उसने जल्दी से नदी में संघर्ष कर रही चींटी को बचने के एक पत्ता तोड़ा और उसकी ओर फेंका और चींटी जल्दी से उस पत्ते पर चढ़ गई और थोड़ी देर बाद पत्ता तैरता हुआ सुखी जमीन की तरफ आ

गया और चींटी ने उस सुखी जमीन पर छलांग लगाईं और बाच गई. फिर उसने उस पेड़ कली ओर उपर देखा और कबूतर को धन्येवाद किया फिर एक दिन एक शिकारी उस नदी किनारे पहुंचा और उसने उस कबूतर की ओर जाल बिछाया और उसने दाना दाल दिया और थोड़ी दूर जाकर छुप गया वह इस उम्मीद में था की कबूतर दाना लेने जरूर आएगा तभी में उस कबूतर को पकड़ लूँगा कबूतर जैसे ही दाना लेने आया की वह उस जाल में फँस गया और उस शिकारी ने कबूतर को पकड़ लिया वह चींटी जिसको कबूतर ने बचाया था उसने देख लिया की वह शिकारी कबूतर को ले जा रहा है  चींटी जल्दी से उस शिकारी के पास गई और उसकी एड़ी में जोर से काट लोया और शिकारी ने तुरंत जाल को छोडकर अपने पैर देखने लगा और इस तरह से कबूतर बच गया.

कर भला हो भला तो इस कहानी से हमे यही सीख मिलती है की जब हम किसी की मदद करते है तो उसका फल हमे जरूर मिलता है जैसे कबूतर ने बिना किसी स्वार्थ के चींटी की जान बचाई उसके फलस्वरूप मुश्किल समय में चींटी ने भी कबूतर की जान बचाई तो बिना किसी स्वार्थ के मदद जरूर करे चाहे वो किसी का भला करने से मदद करने से कभी पीछे न हटें.


एसे ही और भी कहानी पढने के लिए.
मजेदार कहानिया :- hindi kahani

मजेदार कहानियाँ hindi kahani

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अगर आप baccho ki kahaniya या hindi me kahani दूंढ रहे है तो कही जाने की जरुरत नही है आपको यहाँ story for kids in hindi और child story in hindi या bachon ki kahaniyan in hindi या फिर small story in hindi में सब कुछ मिल जाएगा और kahani hindi में read करें.




                                          कहानी 1 - खुद बादलों तो दुनिया बदलेगी.


एक समय की बात है एक बहुत समृद्ध राज्य था, उस देश पर एक राजा शासन किया करता था । एक दिन,उसने सोचा क्यों ना अपने राज्य में थोड़ा घुमा जाये और प्रजा के लोगो की खबर ली जाये और वह यात्रा के लिए निकल गया. अपने देश के कुछ इलाकों में गया और जब वह वापस अपने महल में आया तो उसने शिकायत की कि उसके पैर बहुत दर्द कर रहे है, क्योंकि वह पहली बार इतनी लंबी यात्रा के लिए गया था,  और उसने सड़क पर पैदल यात्रा की थी और उस सड़क पर बहुत मोटे और पथरीले पत्थर भी थे.
राजा ने आदेश दिया की उसके राज्य की सारी सड़कों को चमड़े से कवर किया जाये और सारे नाले ढक दिए जाये. इसके लिए बहुत सारे जानवरों के चमड़े की जरूरत पढने वाली थी इसके साथ ही काफी धन की भी जरूरत पड़ने वाली थी.
तभी एक बुद्धिमान नौकरों में से एक ने राजा को सलाह देने की हिम्मत की और बोला "आप अनावश्यक राशि क्यों खर्च कर रहे है? क्यों ना आप अपने पैरों को कवर करने के लिए चमड़े का एक छोटा सा टुकड़ा कटवा ले और अपने पैरो को कवर कर ले. इस बात को सुन कर राजा हैरान था और सोचने लगा वो कितने धन और समय की बर्बादी करने वाला था. वह अपने नौकर के सुझाव पर सहमत हुआ और अपने लिए एक ' जूता ' बनवाया ।
इस कहानी में जीवन का एक मूल्यवान सबक है: अगर आप इस दुनिया में खुश रहना चाहते है तो इस दुनिया को बदलने की बजाये खुद को और अपने दिल को बदले.



                                             
                                          कहानी 2 - किसी चीज़ का अनादर ना करें 

गर्मियों के दिन चल रहे थे दो आदमी एक साथ पैदल चल रहे थे । गर्मी बहुत बड़ गयी जिसके चलते वो दोनों एक पेड़ के नीचे गए और सोचा थोड़ी देर यही पे आराम करते है और पेड़ की छाया में आराम करने के लिए लेट गए.
तभी एक आदमी ने दूसरे से कहा:- "कितना बेकार पेड़ है ना तो इसमें कोई फल है जिसको हम खा सके ना ही इसकी लकड़ियों का हम कोई इस्तेमाल कर सकते है ये पेड़ किसी काम का नहीं है"
तब पेड़ ने कहा:- " ऐसा मत बोलो इस समय मै  आप के लिए बहुत उपयोगी साबित हो रहा हु मै आप की सूरज की किरणों से रक्षा कर रहा हु आप के जीवन की रक्षा कर रहा हु"

भगवान ने सब को किसी ना किसी काम के लिए बनाया है इसलिये किसी का भी अनादर ना करे .




                                            कहानी 3 - भेड़िया आया भेड़िया आया 

एक समय की बात है एक चरवाहा लड़का था जो की भेड़ के झुंड को चराने के लिए रोज ले जाता था. एक दिन उसने सोचा क्यों ना गाँव वालो को थोड़ा परेशान किया जाये और उसने एक चाल चली. वह चिल्लाया, "बचाओ! भेड़िया! भेड़िया! "
ग्रामीणों ने उसके रोने की आवाज़ सुनी और उसकी मदद के लिए भागते हुए लड़के के पास पहुचे। लेकिन जब वे उसके पास पहुँचे तो उन्होंने पूछा,"भेड़िया कहाँ है?"
लड़के ने जोर से हँसते हुए कहा, "हा, हा, हा! मैंने तुम सभी को मूर्ख बनाया । मै तो मजाक कर रहा था "
कुछ दिनों बाद लड़के ने फिर से यही मजाक किया। वह फिर से रोया, "बचाओ!बचाओ!भेड़िया! भेड़िया! ".गाँव वाले फिर से उसकी  मदद के लिए पहाड़ी की ओर दौड़े और फिर उन्होंने पाया कि लड़के ने उन्हें मुर्ख बनाया था. वे बहुत दुखी हुए और वापस आ गए .
एक दिन की बात है सच में एक भेड़िया आ गया और एक-एक कर के
सारी भेड़ो को मारने लगा.


लड़का चिल्लाते हुए गांव की ओर भागा,"मदद करो! मदद करो! भेड़िया आ गया है! मदद करो कोई!"
गाँव वालो ने उसको रोते हुए सुना लेकिन वे हस पड़े और कोई भी नहीं गया क्योंकि उन्हें लगा कि ये लड़का फिर से मजाक कर रहा है.
लड़का अब चिल्लाता हुआ गाँव में आ गया था और बोला, "एक सियार भेड़ पर हमला कर रहा है. मैं पहले झूठ बोल रहा था, लेकिन इस बार यह है सच! मै झूट नहीं बोल रहा हु"
गाँव वाले ने देखा तो उनकी नजर पड़ गई । यह सच था । बहुत सारी भेड़े मर चुकी थी. लड़का अपनी गलती पे रो रहा था क्यों की उसकी सारी भेड़े मर चुकी थी.

इसलिये हमे कभी भी किसी का विश्वास नहीं खोना चाहयिए.

Friday, 31 August 2018

सारागढ़ी की लड़ाई story in hindi

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आज हम एक ऐसी लड़ाई के बारे में बात करेंगे जो भारतीय इतिहास में कभी नहीं भुलाई जा सकती battle of saragarhi in hindi में अक्षय कुमार की आने वाली फिल्म battle of saragarhi movie इसी इतिहास पर है कैसे 21 सिक्खों ने 10000 अफगानों को हराया movie sons of sardaar the battle of saragarhi अजय देवगन की फिल्म son of sardar का सिक्वल सारागढ़ी की एतिहासिक लड़ाई की कहानी पर ही आधारित होगा story in hindi और battle of saragarhi in hindi story या real life inspirational stories in hindi में read करें.



The battle of saragarhi :-

एतिहास की सबसे बड़ी लड़ाई भारतीय इतिहास में सारागढ़ी की लड़ाई सबसे बड़ी लड़ाई मानी जाती है 
unesco ने इस लड़ाई को दुनिया की सबसे सबसे बेहतरीन 5 लड़ाइयों में शामिल किया है सारागढ़ी की ये कहानी आपको जल्द ही फ़िल्मी परदे पर देखने को मिलेगी.
सारागढ़ी हिंदुकुश पर्वतमाला में स्थित एक चोट गाँव है जो आज पाकिस्तान में है ब्रिटिश शाशन में 36 सिख रेजीमेंट सारागढ़ी चौकी पर तैनात थे अफ्गानिस्तान से लगने वाले इस इलाके पर कब्ज़ा बनाए रखने के लिए अंग्रेज सेना यहाँ तैनात की गई थी ये चौकी रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण थी जो गुलिस्तान और लाकहार्ट किले के बीच में स्थित एक पहाड़ी पर थी.


इस इलाके में अक्सर कब्जी को लेकर अफगानों और अंग्रेजों के बीच लगातार लड़ाइयाँ होती रहती थी.
ये चौकी उन दिनों किलो के बीच एक communication network का काम करती थी british intelligence उस समय स्थानीय कबीलायी विद्रोहियों की बगावत को भाप न सके.
11 september 1897 में आफ्रिदी और अफगानों ने हाथ मिला लिया 27 अगस्त से 11 सितम्बर 1897 के बीच इन विद्रोहियों ने असंगिठित रूप से किले पर दर्जनों हमले किये लेकिन वीर सीखो ने उनके सारे आक्रमण विफल कर दिए आखिर में 12 september 1897 को करीब 12 से 14 हजार दुश्मनों ने सारागढ़ी के सिग्नलिंग पोस्ट पर हमला कर दिया.
वे गुलिस्तान और लोखार्ट के किलोँ पर कब्जा करना चाहते थे इन किलों का महाराजा रणजीत सिंह ने बनवाया था इस किले पर 36वें  रेजीमेंट के 21 जवान तैनात थे हमले की शुरुआत होते ही signal  incharge सरदार गुरमुख सिंह ने Lt.Col. जॉन होफ्टन ब्रिटिश को होलोग्राम पर हमले की सुचना दी लेकिन वो सेना भेजने में असमर्थ रहे अंग्रेज अधिकारी कर्नल जॉन होफ्टन ने तुरंत सिख सिपाहियों को किला छोड़कर किसी सुरक्षित स्थान पर जाने को कहा लेकिन इशर सिंह समेत तभी 21 शूरवीर सैनिकों ने किले को दुश्मन की हाथों में सोंप कर हार स्वीकार करने की बजाए कबीलायी पठानों से मुकाबला करने का फैसला किया और उस अंग्रेज  अधिकारी की बातों को नज़रंदाज़ कर दिया.


दुश्मनों ने इस तरीके से जाल बिछाया था की पास के किलो से मदद तक नहीं ली जा सकती थी बताया जाता है की अफगानों ने हमले के बाद इन सिपाहियों से पोस्ट खाली करके आत्मसमर्पण करने को कहा था लेकिन इन सिपाहियों ने सिख परम्पराओं को अपनाते हुए मरते दम तक दुश्मनों से लड़ने का फैसला किया इशर सिंह के नेत्रत्व में तैनात इन 20 जनों को पहले ही पता चल गया की 12000 अफगानों से जिंदा बचना नामुमकिन है फिर भी ये जवान लड़ाई में जुट गए लांस नायक, लाभ सिंह और भगवान सिंह ने अपनी रायफल उठा ली और दुश्मनों को गोलियों से भूनते हुए आगे बड़े हजारों की संख्या में आए अफगानी पठानों की गोली का पहला शिकार बने भगवान सिंह जो की मुख्य द्वार पर सुख्मानो को रोक रहे थे उधर सीखो के होसलों से पठानों की कैंप में हडकंप मच गया था उन्हें ऐसा लगा की किले के अन्दर अभी भी कोई बड़ी सेना मौजूद है उन्होंने किले पर कब्ज़ा करने के लिए दो बार उसकी दीवार तोड़ने की कोशिश भी की लेकिन वे कामयाब नहीं हो सके हवलदार इशर सिंह ने नेतृत्व सम्भालते हुए अपनी टोली के साथ "जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल"  लगाया और दुश्मनों से जमकर लड़ाई लड़ी उन्होंने बिना हथियार के ही 20 से अधिक अफगानों को मौत के घाट उतार दिया
एक-एक करके वीर सिपाही कम होते जा रहे थे लेकिन उनके हौसलों में कोई कमी नही आई थी गुरमुख सिंह ने अंग्रेज अधिकारी से कहा की हम भले ही संख्या में कम होते जा रहे है लेकिन जब तक हमारे शरीर में खून का एक भी कतरा रहेगा तब तक हम लड़ेंगे इतना कहकर वे भी जंग में कूद पड़े वीर सपूतों ने मौर्चा संभाल रखा था और दुश्मनों पर भरी पड़ रहे थे गोली बारूद खत्म होने पर उन्होंने हाथो और संगीनों से आमने-सामने की लड़ाई लड़ी और लड़ाई लड़ते-लड़ते सुबह से रात हो गई और आखिरकार 20 वीर सिपाही शहीद हो गए.
सारागढ़ी पर बचे आखरी सिपाही गुरमुख सिंह ने सिग्नल टावर के अन्दर से लड़ते हुए 20 अफगानों को मार गिराया जब अफगान गुरमुख सिंह पर काबू नहीं कर पाए तो उन्होंने टावर में आग लगा दी और गुरमुख जिंदा ही जल कर शहीद हो गए जी ते जी उन्होंने दुश्मनों के आगे अपना सर नहीं झुकाया बताया जाता है की शहीद होने वालो में से एक सिख रसोइया भी था जो अपनी अंतिम सांस तक दुश्मनों से लोहा लेता रहा था आखिरकार अफगानों ने सारागढ़ी पर कब्ज़ा तो किया लेकिन अफगानियों को इस लड़ाई में भारी नुकसान सहना पड़ा लड़ाई लड़ते-लड़ते वे पूरी तरह से  थक गए थे और तय रणनीति से भटक गए.
अगले दिन आए अंग्रेजो की दस्ते ने अफगानों को हराकर फिर से सारागढ़ी पर कब्ज़ा कर लिया अंग्रेजो के फिर से कब्जे के बाद सिख सैनिको की बहादुरी दुनिया के सामने आई अंग्रेज सैनिकों को वहां अफगानों की एक हज़ार की आस-पास लाशें मिली 12 september 1897 को सिख लैंड की धरती पर हुआ यह युद्ध दुनिया की पांच महानतम लड़ाइयोँ मेँ गिनी गई.


जब ये खबर यूरोप पहुंची तो पूरी दुनिया चकित रह गई ब्रिटेन की संसद में सभी ने खड़े होकर इन 21 वीरों की बहादुरी को सलाम किया इन सभी को मरणोपरांत इंडियन आर्डर ऑफ़ मेरिट दिया गया जो आज के परमवीर चक्र के बराबर था बाद मे लड़ाई के इस मार्ग रूप में अंग्रेजो ने अमृतसर, फिरोजपुर और वज्रिस्तान में 3 गुरूद्वारे बनवाए.
ब्रिटेन में आज भी सारागढ़ी की जंग को शान से याद किया जाता है इतिहास कारों के मुताबिक पाकिस्तान की नॉर्थ फ्रंटियर पोस्ट के जिला कोहार में करीब 6000 फ़ीट ऊँची पहाड़ीयों पर सारागढ़ी नाम का छोटा सा किला आज भी मौजूद है.
मौजूदा समय में पाकिस्तानी सेना द्वारा सिग्नल स्टेशन के तौर पर इसका इस्तेमाल किया जा रहा है भारतीय सेना की आधुनिक सिख रेजीमेंट 12 september को हर साल सारागढ़ी दिवस मानाती  है यह दिन उत्सव का होता है जिसमे सारागढ़ी के शूरवीरों  की पराक्रम और बलिदान के सम्मान में जश्न मनाया जाता है.
2012 में आई अजय देवगन की फिल्म son of sardar का सिक्वल सारागढ़ी की एतिहासिक लड़ाई की कहानी पर ही आधारित होगा साथ ही राज कुमार संतोषी भी इसी कहानी पर the battle of saragarhi नाम से फिल्म बना रहे है.
सारागढ़ी की पढाई यूरोप के सभी स्कूल में पढाई जाती है लेकिन हमारे दश में इसे जानते तक नहीं आपने greek sparta and persian war के बारे में तो सुना ही होगा जिसके ऊपर three hundred जैसी movie भी बन चुकी है इस लड़ाई के आगे spartans की लड़ाई भी फीकी पड़ जाती है पर बहुत ही अफ़सोस होता है की जो बात हम भारतियों को पता होनी चाहिए उसके बारे में हम जानते तक नहीं बेखबर है और इसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते है.

manikarnika the queen of jhansi- rani of jhansi
dr. bhim rao ambedkar - story 
rajat sharma  -  real life inspirational stories in hindi


Tuesday, 28 August 2018

मणिकर्णिका rani of jhansi

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बहादुरी, देशभक्ति और सम्मान की प्रतीक jhansi ki rani laxmi bai और jhansi ki rani story को हिंदी में पढ़े और jhansi ki rani history या फिर rani laxmi bai information और gangadhar rao के बारे में भी बताया गया है और आप इस post में  jhansi ki rani poem  की poem को भी read कर सकते है .



झाँसी की रानी:-


रानी लक्ष्मी बाई के बारे में तथ्य और जानकारी

 जन्म                                                मणिकर्णिका तांबे, 19 नवंबर 1828
 जन्म स्थान                                        वाराणसी, भारत
 राष्ट्रीयता भारतीय
 पिता                                                मोरोपंत तांबे
 माता                                                भागीरथी
 मृत्यु                                               18 जून 1858 (29 वर्ष), भारत के ग्वालियर के पास कोटा के सराय में
                                                             पति झांसी नरेश महाराजा गंगाधर रावनेवालकर
 संतान                                               उन्होंने एक लड़के को जन्म दिया, जिसकी चार महीने की उम्र में                                                                       मृत्यु हो गयी, उसके बाद 1851 में दामोदर राव को गोद लिया,
 शिक्षा                                               उन्होंने अपनी शिक्षा घर पर प्राप्त की थी और अपने उम्र के अन्य                                                                    लोगों से अधिक आत्मनिर्भर थी; उनके अध्ययन में निशानेबाजी,                                                                     घुड़सवारी और तलवारवाजी शामिल थी।
योगदान के रूप में जाना जाता है         लक्ष्मीबाई
 पुरस्कार और सम्मान                         हिंदुओं की देवी लक्ष्मी का सम्मान


हमारे देश की स्वतंत्रता के लिए बहुत से राजाओं ने लड़ाइयाँ लड़ी और इस कोशिश में हमारे देश की वीर तथा साहसी स्त्रियों ने भी उनका साथ दिया इन वीरांगनाओ में रानी दुर्गावती रानी, लक्ष्मीबाई आदि का नाम शामिल है.

रानी लक्ष्मीबाई का पूरा नाम है मणिकर्णिका तांबे शादी के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई हो गया था.  इनका जन्म सन 19 नवम्बर 1828 को हुआ था इनकी म्रत्यु सन 18 जून 1858 में हो गई थी इनके पिता का नाम है मोरोपंत तांबे इनकी माता का नाम था भागीरथी सापरे इनके पति झाँसी नरेश महाराज गंगाधर राव नेवालकर थे इनकी संतान दामोदर राव (आनंद राव) इनका घराना मराठा साम्राज्य उल्लेखनीय कार्य सन 1857 का स्वतंत्रता संग्राम


महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म एक महाराष्ट्रियन ब्राह्मण परिवार में सन 1828 में काशी में हुआ उनके पिता मोरोपंत तांबे बिठुर में न्यायालय में पेशवा थे और इसी कारण वे इस काम में प्रभावित थी और उन्हें अन्य लड़कियों की अपेक्षा अधिक स्वतंत्रता भी प्राप्त थी उनकी शिक्षा-दीक्षा में पढाई के साथ-साथ आत्मरक्षा घुड़सवारी, निशानेबाजी और घेराबन्धी का प्रक्षिशन भी शामिल था उन्होंने अपनी सेना भी तयार की थी उनकी माता भागीरथी बाई ग्रेह्नी थी उनका नाम बचपन में  मणिकर्णिका रखा गया और परिवार के सदस्य उन्हें प्यार से मनु कहकर पुकारते थे जब वे 4 साल की थी तभी उनकी माता का देहांत हो गया था और उनके पालन-पोषण की साड़ी जिम्मेदारी उनके पिता पर आ गई थी रानीलक्ष्मीबाई में अनेक विशेषताएँ थी जैसे:- नियमित योगा अभ्यास करना, धार्मिक कार्यों में रुचि .................... उहे घोड़ो की अच्छी परख थी रानी लक्ष्मीबाई अपने प्रजा का बहुत अच्छे से ख्याल रखती थी गुन्हेगारों को उचित सजा देने की भी हिम्मत रखती थी रानी लक्ष्मीबाई की शादी सन 1842 में उनका विवाह उत्तर भारत में स्थित झाँसी राज्य के महाराज गंगाधर राव नेवालकर के साथ हो गया तब वह झाँसी की रानी बनी उस समय वह मात्र 14 साल की थी विवाह के पश्चात ही उन्हें लक्ष्मीबाई नाम मिला उनका विवाह प्राचीन झाँसी में सिद्ध गणेश मंदिर में हुआ था सन 1891 में उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम दामोदर राव रखा गया परन्तु दुर्भाग्य वश वह 4 महीने ही जीवित रह सका ऐसा कहा जाता है की महाराज  गंगाधर राव नेवालकर अपने पुत्र की म्रत्यु से कभी उभर ही नहीं पाए और सन 1853 में महाराज बहुत ही बीमार पड़ गए तब उन दोनों ने मिलकर अपने रिश्तेदार महाराज गंगाधर राव के भाई के पुत्र को गोद लिया इस प्रकार गोद लिए गए पुत्र के उत्तराधिकारी पर ब्रिटिश सरकार कोई आपत्ति ना ले इसलिए वह कार्य ब्रिटिश अफसरों की उपस्थिति में पूर्ण किया गया इस बालक का नाम आनंद राव था जिसे बाद में बदलकर दामोदर राव रखा गया रानी लक्ष्मीबाई का उत्तराधिकारी बनना 21 नवम्बर सन 1853 में महाराज गंगाधर राव नेवालकर की म्रत्यु हो गई उस समय रानी की आयु मात्र ही 18 वर्ष की थी लेकिन रानी ने अपना धैर्य और साहस नहीं खोया और बालक दामोदर की आयु कम होने के कारण राज्य काज का उत्तरदाय्तव  महारानी लक्ष्मीबाई ने स्वयं पर ले लिया उस समय लार्ड डलहौज़ी गवर्नर थे और उस समय ये नियम था की शाशन पर उत्तराधिकारी तभी होगा जब राजा का स्वयं का पुत्र हो यदि पुत्र ना हो तो उसका राज्य East India Company में मिल जाएगा और राज्य परिवार को अपने  खर्चे हेतु पेंशन  दी जाएगी उसने महाराज की म्रत्यु का फ़ायदा उठाने की कोशिश की वह झाँसी को ब्रिटिश राज्य में मिलाना चाहता था उसका कहना था की महाराज गंगाधर राव नेवालकर और महारानी लक्ष्मीबाई की अपनी कोई संतान नहीं है और उसे इस प्रकार गोद लिए गए पुत्र को राज्य व उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया तब महारानी लक्ष्मीबाई ने london में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ मुकदमा दायर किया पर वहां उनका मुकदमा ख़ारिज कर दिया गया साथ ही ये आदेश भी दिया गया की महारानी झाँसी के किले को खाली कर दे और स्वयं रानी महल में जाकर रहे इसके लिए उन्हें रूपए 60,000 की पेंशन दी जाएगी परन्तु रानी लक्ष्मीबाई अपनी झाँसी को ना देने फैसले पर अड़ी रही वह अपने झाँसी को सुरक्षित करना चाहती थी जिसके लिए उन्होंने सेना संगठन को प्रारम्भ किया.

संघर्ष की शुरुआत :-

7 मार्च 1854 को ब्रिटिश सरकार ने एक सरकारी गजट जारी किया जिसके अनुसार झाँसी को  ब्रिटिश साम्रराज्य में मिलने का आदेश दिया गया था रानी लक्ष्मीबाई को ब्रिटिश अफसर एलिस द्वारा ये आदेश मिलने पर उन्होंने इसे मानने से इनकार कर दिया और कहा मेरी झाँसी नहीं दूंगी अब झाँसी विद्रोह का केंद्र बिंदु बन गया रानी लक्ष्मीबाई ने कुछ अन्य राज्यों की मदद से एक सेना तयार की जिसमे केवल पुरुष ही नहीं अपितु महिलाएं भी शामिल थी जिन्हें युद्ध में लड़ने के लिए प्रक्षिशन भी दिया गया था उनकी सेना ने अनेक महारथी भी थे जैसे :- गुलाम गोस, दोस्त खान, खुदा बक्श, सुन्दर-मुन्दर काशीबाई, लाल भाऊ बक्षी, मोती बाई, दीवान रघुनाथ सिंह ओए दीवान जवाहर सिंह जैसे नाम शामिल थे. लगभग 14,000 सैनिक थे.


10 मई 1857 को मेरठ में भारतीय विद्रोह प्रारम्भ हुआ जिसका कारण था की जो बंदूकों की नइ गोलियां थी उस पर सुआर और गौ मॉस की परत चड़ी थी इससे हिन्दुओं की धर्मिक भावनाओं पर ठेस लगी थी और इस कारण ये विद्रोह देश भर में फ़ैल गया था इस विद्रोह को दबाना ब्रिटिश सरकार के लिए ज्यादा जरुरी था  अतः उन्होंने फिलहाल झांसी को रानी  लक्ष्मीबाई के अधीन छोड़ने का निर्णय लिया था इस दौरान सन सितम्बर-अक्टूबर 1857 में रानी लक्ष्मीबाई को अपने पड़ोसी देश को "ओरछा" और "दतिया" के राजाओं के साथ युद्ध करना पड़ा क्यूंकि उन्होंने झाँसी पर चढाई कर दी थी इसके कुछ समय बाद मार्च 1858 में अंग्रेजो ने झाँसी पर हमला कर दिया और तब झाँसी की ओर से तात्य टोपे के नेत्रत्व में 20,000 सैनिक के साथ ये लड़ाई लड़ी गई जो लगभग 2 सप्ताह तक चली अंग्रेजी सेना की दीवारों को तोड़ने में सफल रही और नगर पर कब्ज़ा कर लिया इस समय अंग्रेज सरकार झांसी को हथियाने में कामयाब रही और अंग्रेजी सैनिको और लूट-पाट भी शुरू कर दी थी फिर भी रानी लक्ष्मीबाई किसी प्रकार अपने पुत्र दामोदर राव को बचाने में सफल रही.

कालपी की लड़ाई :-

हार जाने के कारण उन्होंने सत्त 24 घंटे में 102 मील तय किया और अपने डाल के साथ कालपी पहुंची और कुछ समय कालपी में शरण ली जहां वह  तात्य टोपे के साथ थीं तब वहां के पेशवा ने परिस्थिति को समझकर उन्हें शरण दी और अपना सैन्य बल भी प्रदान किया 22 मई 1858  को सर ह्यूरोज ने कालपी पर आक्रमण कर दिया था तब रानी लक्ष्मीबाई ने वीरता और रणनीति पूर्वक उन्हें परास्त किया और अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा कुछ समय पश्चात  का हार जाने के कारण सर ह्यूरोज ने कालपी पर फिर से हमला किया और इस बार रानी को हार का सामना करना पड़ा युद्ध में हारने के पश्चात राव साहेब पेशवा बंदा के नवाब तात्य टोपे, रानी लक्ष्मीबाई, और अन्य मुख्य योद्धा गोपाल नूर एक मात्र हुए रानी ने ग्वालियर पर अधिकार प्राप्त करने का सुझाव दिया ताकि वह अपने लक्ष्य में सफल हों सके वही रानी लक्ष्मीबाई और तात्य टोपे ने इस प्रकार गठित एक विद्रोही सेना के साथ मिलकर ग्वालियर पर चढाई कर दी वहाँ इन्होने ग्वालियर के महाराजा को परासित किया और रणनीतिक तरीके से ग्वालियर के जिले पर जीत हासिल की और ग्वालियर का राज्य पेशवा को शोंप दिया.


रानी लक्ष्मीबाई की म्रत्यु  :-

17 जून 1858 में किंग्स रॉयल आयरिश के खिलाफ युद्ध लड़ते समय उन्होंने ग्वालियर के पूर्व क्षेत्र का इस युद्ध में इनकी सेविकाएँ तक शामिल थीं और पुरुषों की पोषक धारण के साथ ही उतनी ही वीरता से युद्ध भी कर रहीं थी इस युद्ध के दौरान वे अपने राज-रतन नामक घोड़े पर सवार नहीं थी और ये घोड़ा नया था जो नहर के उस पार नहीं कूद पा रहा था रानी स्थिति को समझ गई और वीरता के साथ यहीं युद्ध करती रहीं इस समय वह पूरी तरह से घायल हो चुकीं थी और वह घोड़े पर से गिर पड़ी क्यूंकि वह पुरुष पोशाक में थी अतः उन्हें अंग्रेजी सैनिक पहचान नहीं पाए और उन्हें छोड़ दिया तब रानी के विश्वाश पात्र सैनिक उन्हें पास की गंगादास मठ में ले गए और उन्हें गंगाजल दिया तब उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा बताई की कोई भी फिरंगी उनकी म्रत्यु को हाथ ना लगाए इसीलिए उन्होंने एक संत को कहा था की उनका डाह संस्कार कर दे. 17 जून 185 8 को उनका देहांत हो गया.


उनकी इच्छा के अनुसार उनके शव का दाह संस्कार 18 जून 1858 को किया गया इस प्रकार कोटा की सराई के पास ग्वालियर के फूल बाग़ क्षेत्र में उन्हें वीर गति प्राप्त हुई अर्थात वह म्रत्यु को प्राप्त हुई ब्रिटिश सरकार ने 3 दिन बाद ग्वालियर को हथिया लिया उनके म्रत्यु के पश्चात उनके पिता मोरोपंत तांबे को गिरफ्तार कर लिया और फांसी की सजा दी गई रानी लक्ष्मीबाई के पुत्र दामोदर राव को ब्रिटिश राज्य द्वारा पेंशन दी गई और उन्हें उनका उत्तराधिकारी कभी नहीं मिला बाद में राव इंदौर शहर में बस गए और उन्होंने अपने जीवन का बहुत समय अंग्रेज सरकार को मनाने एवं अपने अधिकारों को पुनः प्राप्त करने के प्रयासों में व्यतीत किया और उनकी म्रत्यु 28 मई 1906 को हो गई इस प्रकार देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए उन्होंने अपनी जान तक न्योछावर कर दी.
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.



झाँसी की रानी poem

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताएँ
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि सी वह आयी झांसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताएँ
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
                                - सुभद्रा कुमारी चौहान


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Friday, 24 August 2018

Super 30 के सुपर हीरो आनंद कुमार motivational story in hindi

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जितनी रात अँधेरी हो रही है, उतने ही आप सवेरे के नजदीक पहुँच रहे हो केवल हिम्मत मत हारो, धैर्य बनाए रखो. जिसने इतना कुछ सहने के बाद भी हार नहीं मानी और आगे बढ़ते गए और आज पुरे देश में जाने जाते है जिनका नाम है anand kumar super 30 हौसला बढ़ाने वाली ये एक ऐसे real life inspirational stories in hindi में है और  inspirational stories for students और inspirational stories for teachers के लिए है इस post में आपको motivation in hindi में बताया गया है और इसके आलावा importance of teacher in students life in hindi में बताया गया है आप इस post से सीख ले सकते है.



सुपर 30 आनंद कुमार 



बुझी हुई समा फिर से जल सकती है,
भयंकर से भयंकर तूफान से कश्ती निकल सकती है;
निरास ना हो मायूस ना हो दोस्तों सिर्फ मेहनत करके देख किस्मत बदल सकती है.


हर वो बच्चा जो engineering करना चाहता है उसका एक सपना होता है iit में addmision लेने का लेकिन IIT के entrance exam इतने tough होते है की आजकल उसके लिए ही अलग से coaching और institute बन गए है और भाई इस coaching की fees ही इतनी ज्यादा होती है के जो हमारे गरीब बच्चे वो इन coaching में addmision ही नहीं ले पाते है ऐसे ही बच्चों के लिए एक फ़रिश्ता बनकर आए है ANAND KUMAR.
ANAND KUMAR "SUPER 30" नाम से एक coaching चलाते है तो आज हम इन्ही के बारे में जानेंगे की कैसे इन्होने अपनी journey start की.


ANAND KUMAR का जन्म 1 january 1973,PATNA (बिहार की राजधानी) में हुआ था उनके पिता एक post department में एक clerk थे और उनकी family की financial condition बहुत ही ख़राब थी इस वजह से उनके पिता उनकी private schooling afford नहीं कर सकते थे जिस वजह से ANAND को government स्कूल में पढ़ना पढ़ा और इस स्कूल में ANAND का interest mathematics में बहुत ज्यादा बढ़ गया था और अपनी gradution के time ANAND ने number theory पर कुछ ऐसे notes बनाए की उन्हें 'The Mathematical  Gazette' और 'Mathematical Spectrum' जैसी बड़ी किताबों में publish किया गया.
ANAND ने campbridge university में addmision भी secure कर लिया था पर अपनी financial condition की वजह से वो वहाँ पर जा ना सके और इसी दौरान एक दुर्घटना घटी और उनके पिता की death हो गई अब ANAND के उपर अपने परिवार की साड़ी जिम्मेदारी आ गई थी पर ANAND यहाँ पर टूटे नहीं और अपनी mathematics की पढाई जारी रक्खी और रात में वो अपनी माँ के साथ मिलकर पापड़ भी बेचते थे जिससे की उनके परिवार का पेट पलता था कुछ extra पैसे कमाने के लिए ANAND KUMAR बच्चों को tution देना भी start कर दिया था.
 ANAND को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था पर patna university में विदेशी किताबें ना होने की वजह से ANAND को हर हफ्ते बनारस जाना पड़ता था बनारस में उनके छोटे भाई violin सीख रहे थे वो उनके साथ hostel रूम में ही रुक जाते थे saturday और sunday को वो BHU के central library विदेशी authors की किताब पड़ते थे इसके बाद 1992 में ANAND ने  एक कमरा किराय पर लिया और उसमे ramanujan school of mathematics के नाम से अपना institute खोल लिया वहां पर वो बच्चों को mathematics की coaching देते थे 1 साल के अंदर-अंदर उनके पास 36 बच्चे हो गए थे इसी तरह धीरे-धीरे ANAND की coaching में बच्चे बढ़ते चले गए और लग-भग 3 साल में उनके पास 500 बच्चे हो गए थे तो इस तरह ANAND की ज़िन्दगी में सबकुछ फिरसे normal हो चूका था पर तभी साल 2009 में आनंद के पास एक बच्चा आया जो की अपनी गरीबी की वजह से IIT के entrance exams की तयारी नहीं कर सकता था और इस बच्चे से ANAND को SUPER 30 coaching खोलने का motivation मिला बाद में इसी SUPER 30 ने ANAND को पूरी दुनिया में famous कर दिया.


SUPER 30 coaching अब हम इसके बारे में जान लेते है SUPER 30 एक coaching institute है जो की गरीब बच्चो को free में IIT के entrance exam की तयारी करवाती है ये coaching हर साल may में एक competitive exam organise करवाती है और उसमे से 30 सबसे ज्यादा talented बच्चों को select किया जाता है और उन्हें free में IIT की coaching  दी जाती है इन बच्चो के लिए ANAND की माँ jayanti devi खाना पकातीं है और ANAND पढाई से related दुसरे काम देखते है और उन्हें 1 साल तक free में hostel में रहने के लिए सुविधा उपलब्ध करवाते है ANAND के भाई प्रणव इस coaching के management को देखते है.
2003-2017 तक ANAND के पढाए हुए 450 बच्चों में से 391 बच्चों का selection IIT में हुआ इसके आलावा इस साल यानि 2017 में ANAND के पढ़ाए हुए सभी 30 बच्चों का selection IIT में हुआ ANAND KUMAR के पास SUPER 30 के लिए किसी भी government या किसी भी private agencies से भी financial support नहीं है.

जब उनकी coaching famous होने लगी तो उनके पास कुछ sponsors भी आए पर वो एक एक करके सबको माना करते रहे उनक कहना है की वो अकेले के दम पर इस coaching को बहुत आगे ले जाना चाहते है इसी वजह से ramanujan institute और शाम की उनकी patna की classes से जितने भी पैसे मिलते है वो उसे SUPER 30 के लिए फण्ड के रूप में इस्तेमाल करते है.
ANAND की coaching कुछ माफिआओं से देखि नहीं गई इसी लिए उन पर एक जान लेवा हमला भी हुआ था पर कहते है न जिसके साथ भगवान् होता है ना उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता ANAND बाच गए और इस नेक काम में दुबारा से जुट गए 2010 में ANAND KUMAR के SUPER 30 को TIME MAGAZINE में asia के best institute में भी शामिल किया.


ANAND का नाम SUPER 30 जैसे नेक काम के लिए LIMCA BOOK OF RECORDS में भी दर्ज है इसके आलावा Indian government और बिहार government की तरफ से ANAND को कई awards भी मिल चुके है जिनमे Maulana azad award, Ramanujan award भी शामिल है ANAND के पास इतने awards है की उनके उपर अलग से ही एक किताब लिखी जा सकती है.
ANAND KUMAR के इस जूनून उनके एसे जज्बे को हम सलाम करते है.



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